कौटिल्य के मंडल सिद्धांत और भारत की समकालीन पड़ोसी नीतिः कूटनीतिक हितों, सुरक्षा और शक्ति-संतुलन का अध्ययन
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Abstract
भारतीय राजनीतिक चिंतन में कौटिल्य का मंडल सिद्धांत राज्य-व्यवहार, विदेश नीति और शक्ति-संबंधों को समझने का एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रस्तुत करता है। यह सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि किसी भी राज्य की बाह्य नीति स्थिर भावनात्मक संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा आवश्यकताओं और शक्ति-संतुलन के यथार्थ मूल्यांकन के आधार पर निर्मित होती है। कौटिल्य ने पड़ोसी राज्यों, मित्र राज्यों, मध्यस्थ शक्तियों और शत्रु शक्तियों के संबंधों को जिस व्यावहारिक दृष्टि से समझाया, वह आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की यथार्थवादी प्रवृत्तियों को समझने में उपयोगी प्रतीत होता है।
समकालीन भारत की पड़ोसी नीति को इसी दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत अपने आसपास के क्षेत्र में केवल सांस्कृतिक निकटता या ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर नीति नहीं बनाता, बल्कि सुरक्षा, सीमा-प्रबंधन, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री हित, संपर्क-सुविधा और सामरिक संतुलन जैसे अनेक कारकों को ध्यान में रखता है। पाकिस्तान और चीन के साथ सुरक्षा-संबंधी चुनौतियाँ, नेपाल और भूटान के साथ भौगोलिक-सामरिक निकटता, बांग्लादेश के साथ संपर्क और सीमा-प्रबंधन, श्रीलंका और मालदीव के साथ समुद्री हित तथा म्यांमार के साथ पूर्वोत्तर सुरक्षा और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति-ये सभी भारत की पड़ोसी नीति को बहुआयामी बनाते हैं।
प्रस्तुत शोध-पत्र में कौटिल्य के मंडल सिद्धांत को भारत की वर्तमान पड़ोसी नीति के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक यथार्थवाद आज की विदेश नीति में प्रत्यक्ष रूप से न सही, परंतु वैचारिक संकेतों के रूप में अवश्य दिखाई देता है। भारत की पड़ोसी नीति में सहयोग और सतर्कता, संवाद और दबाव, विकास-सहायता और सामरिक तैयारी, तथा क्षेत्रीय नेतृत्व और शक्ति-संतुलन का जो मिश्रित स्वरूप दिखाई देता है, वह कौटिल्यीय राजनीतिक दृष्टि की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
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