राजपूत कालीन राजस्थान के किलों और महलों में पर्यावरणीय अनुकूलन और जलवायु-संवेदनशील स्थापत्य का अध्ययन

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चारू बारी
डॉ. सोनू सारण

Abstract

राजस्थान की स्थापत्य परंपरा भारतीय वास्तुकला की एक विशिष्ट और समृद्ध धरोहर है, जिसमें राजपूत कालीन किलों और महलों का विशेष स्थान है। राजस्थान की भौगोलिक स्थिति, मरुस्थलीय जलवायु, ऊष्ण तापमान, जल की कमी, तेज धूप, धूलभरी आँधियाँ और सीमित प्राकृतिक संसाधनों ने यहाँ की स्थापत्य शैली को गहराई से प्रभावित किया। राजपूत शासकों ने किलों और महलों के निर्माण में केवल सौंदर्य, शक्ति और वैभव को ही महत्व नहीं दिया, बल्कि पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे स्थापत्य समाधान विकसित किए जो जलवायु-संवेदनशील और व्यावहारिक दोनों थे।


राजपूत कालीन राजस्थान के किलों और महलों में मोटी दीवारों, ऊँचे परकोटों, आंतरिक आँगनों, झरोखों, जालियों, छतरियों, संकरे मार्गों, ऊँची छतों, पत्थर के उपयोग, वायु-संचार व्यवस्था और जल-संग्रह प्रणालियों का विशेष महत्व दिखाई देता है। ये स्थापत्य तत्व केवल सजावटी नहीं थे, बल्कि गर्मी से बचाव, प्रकाश नियंत्रण, प्राकृतिक वेंटिलेशन, ताप संतुलन, सुरक्षा और जल संरक्षण जैसे कायार्ें से भी जुड़े हुए थे। आमेर, मेहरानगढ़, चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, जैसलमेर और उदयपुर के राजमहलों तथा दुर्गों में जलवायु के अनुकूल स्थापत्य योजना के अनेक उदाहरण मिलते हैं।


प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य राजपूत कालीन राजस्थान के किलों और महलों में पर्यावरणीय अनुकूलन और जलवायु-संवेदनशील स्थापत्य तत्वों का अध्ययन करना है। इसमें यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार राजस्थान की कठोर जलवायु ने स्थापत्य रूपों, निर्माण सामग्री, स्थान चयन, जल प्रबंधन और आंतरिक विन्यास को प्रभावित किया। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि राजपूत स्थापत्य केवल कलात्मक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि वह स्थानीय पर्यावरण, जलवायु और संसाधनों के साथ गहरे सामंजस्य का उत्कृष्ट उदाहरण भी था।

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How to Cite
[1]
चारू बारी and डॉ. सोनू सारण, “राजपूत कालीन राजस्थान के किलों और महलों में पर्यावरणीय अनुकूलन और जलवायु-संवेदनशील स्थापत्य का अध्ययन”, IEJRD - International Multidisciplinary Journal, vol. 10, no. 2, p. 10, Oct. 2025.

References

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